तब बग्घी ही पटना के रईसों का वाहन था

19 वीं सदी के मध्य में पटना शहर का विस्तार पश्चिम दरवाजा के पश्चिम में दूर तक हो चला था। नए शहर के वाशिंदे, जिनमें यूरोपियन और संपन्न स्थानीय निवासी थे, की निर्भरता अलग अलग जरूरतों के लिए पुराने शहर पर थी और पुराने शहर के वाशिंदों का सरकारी दफ्तरों और शिक्षण सुविधाओं के लिए नए शहर पर निर्भरता थी। दोनों की परस्पर निर्भरता को देखते हुए तेज गति वाले वाहन की जरूरत महसूस की गयी।
अब तक लोग टमटम की सवारी ही कर रहे थे। यह दो घोड़ों द्वारा खींचा जाने वाला सदियों पुरानी व्यवस्था थी। लेकिन अब आम लोगों के लिए तेज गति वाले वाहन की जरूरत थी। अमीर और संपन्न लोग तेज घोड़ों की या घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले बग्घी की सवारी करते थे।
यह जानना रोचक होगा कि पटना के उल्फत हुसैन फ़रयाद पहले हिंदुस्तानी थे जिसके पास बग्घी थी। पटना के तत्कालीन कमिश्नर मेटकॉफ़ ने यह बग्घी इंग्लैंड से मंगवा कर फ़रयाद को तोहफे में दिया था। नवाब लुफ्त अली खान दूसरे रईस थे जिनके पास यह बग्घी थी। उन्होंने इसे कलकत्ता से मंगवाया था। इसे बाद शीघ्र ही यह शहर के रईसों का पसंदीदा वाहन बन गया। कौन कितने घोड़ों के वाहन की सवारी करता है, यह उस व्यक्ति की सम्पन्नता का मापदंड बन गया। विलियम टेलर चार मजबूत और शानदार अरबी घोड़ों की बग्घी पर चढ़ता था।
पालकी का प्रयोग सार्वजनिक परिवहन के तौर पर होता था। शहर के अंदर या बाहर जाने के लिए आम लोग इसका प्रयोग करते थे। अमीर लोगों की अपनी पालकी होती थी। बिशप हेबेर ने अपने पटना प्रवास में तोंजों नाम के एक अन्य वाहन को देखा था। यह कुछ कुछ टमटम की तरह होता था। इसमें एक तम्बूनुमा शामियाना लगा होता था जो पर्दा का काम करता था। यह एक घोड़े या दो बैलों द्वारा खींचा जाता था।
शहर के अमीर और रईस शाम की तफरीह के लिए चांदी के जेवरों से सजे हाथियों की सवारी भी करते थे। कुछ लोग बैलों द्वारा खींचे जाने वाले वाहन की भी सवारी करते थे। इन बैलों के सींग चांदी से मढ़े गए होते थे। रात के वक्त यात्रा के दौरान नौकर मशाल लेकर साथ साथ रास्ता दिखाते चलते थे। कई बार जब रईसों की सवारी निकलती थी तो वर्दियों में सजे, हाथों में तलवार लिए उनके मुलाज़िम साथ होते थे।
थोड़े से वक्त के लिए तेज आवागमन के लिए अशोक राजपथ पर घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले ट्राम की भी शुरुआत हुई थी लेकिन 1903 में ही इसे बंद कर दिया गया।

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